Shayari Hindi

 और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

                                                माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं

                                                तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख

वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन

उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा

                                                    हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
                                                    दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है





बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था
हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है





उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

                                ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
                                इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

                              हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
                             बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा





रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

                                                          कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
                                                         आज तुम याद बे-हिसाब आए

तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि क़ाफ़िले क्यूँ लुटे
तिरी रहबरी का सवाल है हमें राहज़न से ग़रज़ नहीं

                                                        किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
                                                        कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा




उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

                                                     मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
                                                     उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

                                                        अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ
                                                        अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ

बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई
इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया

                                                          कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
                                                          यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता





इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

                                                   होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
                                                   इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है


की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना



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