ईद अल-अज़हा
ईद-ए-कुर्बां का मतलब है बलिदान की भावना। अरबी में 'क़र्ब' नजदीकी या बहुत पास रहने को कहते हैं मतलब इस मौके पर अल्लाह् इंसान के बहुत करीब हो जाता है। कुर्बानी उस पशु के जि़बह करने को कहते हैं जिसे 10, 11, 12 या 13 जि़लहिज्ज (हज का महीना) को खुदा को खुश करने के लिए ज़िबिह किया जाता है। कुरान में लिखा है: हमने तुम्हें हौज़-ए-क़ौसा दिया तो तुम अपने अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ो और कुर्बानी करो।
बकरा ईद में लोगों को एक बकरे की कुर्बानी दे और एक बकरे का भी पालन करें।
इस ईद को विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे
- ईदुल अज़हा
- ईद अल-अज़हा
- ईद उल-अज़हा
- ईद अल-अधा
- ईद उल ज़ुहा
त्याग का उत्थान
[संपादित करें]कुरबानी यानि ईद उल अजहा का त्यौहार हिजरी के आखिरी महीने ज़ु अल-हज्जा के १० वें दिन मनाते हैं। पूरी दुनिया से मुसलमान इस महीने में मक्का सऊदी अरब में एकत्र होकर हज मनाते है। वास्तव में यह हज की एक अंशीय अदायगी और मुसलमानों के भाव का दिन है। दुनिया भर के मुसलमानों का एक समूह मक्का में हज करता है बाकी मुसलमानों के अंतरराष्ट्रीय भाव का दिन बन जाता है। ईद उल अजहा का अक्षरश: अर्थ त्याग वाली ईद है इस दिन जानवर की कुर्बानी देना एक प्रकार की प्रतीकात्मक कुर्बानी है।[4][5]
हज और उसके साथ जुड़ी हुई पद्धति हजरत इब्राहीम और उनके परिवार द्वारा किए गए कार्यों को प्रतीकात्मक तौर पर दोहराने का नाम है। हजरत इब्राहीम के परिवार में उनकी पत्नी हाजरा और पुत्र इस्माइल थे। मान्यता है कि हजरत इब्राहीम ने एक स्वप्न देखा था, जिसमें वह अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी दे रहे थे। हजरत इब्राहीम अपने दस वर्षीय पुत्र इस्माइल को ईश्वर की राह पर कुर्बान करने निकल पड़े। पुस्तकों में आता है कि ईश्वर ने अपने फ़रिश्ते को भेजकर इस्माइल की जगह एक जानवर की कुर्बानी करने को कहा। दरअसल इब्राहीम से जो असल कुर्बानी मांगी गई थी वह थी उनकी खुद की थी अर्थात् ये कि खुद को भूल जाओ, मतलब अपने सुख-आराम को भूलकर खुद को मानवता/इंसानियत की सेवा में पूरी तरह से लगा दो। तब उन्होनें अपने पुत्र इस्माइल और उनकी मां हाजरा को मक्का में बसाने का निर्णल लिया। लेकिन मक्का उस समय रेगिस्तान के सिवा कुछ न था। उन्हें मक्का में बसाकर वे खुद मानव सेवा के लिए निकल गये।
इस तरह एक रेगिस्तान में बसना उनकी और उनके पूरे परिवार की कुर्बानी थी जब इस्माइल बड़े हुए तो उधर से एक काफिला (कारवां) गुजरा और इस्माइल का विवाह उस काफिले (कारवां) में से एक युवती से करा दिया गया फिर प्रारम्भ हुआ एक वंश जिसे इतिहास में इश्माइलिट्स, या वनु इस्माइल के नाम से जाना गया। हजरत मुहम्मद साहब का इसी वंश में जन्म हुआ था। ईद उल अजहा के दो संदेश है पहला परिवार के बड़े सदस्य को स्वार्थ के परे देखना चाहिए और खुद को मानव उत्थान के लिए लगाना चाहिए ईद उल अजहा यह याद दिलाता है कि कैसे एक छोटे से परिवार में एक नया अध्याय लिखा गया।
अरबी के अलावा अन्य भाषाओं में, नाम को अक्सर स्थानीय भाषा में अनुवादित किया जाता है, जैसे कि
- इंग्लिश - फ़ीस्ट ऑफ़ द सैक्रिफ़ाइस,
- जर्मन - ओप्फ़रफ़ेस्थ,
- डच - ऑफ़रफेस्ट
- रोमानियाई साबरबोआटेरा सैक्रिफिइलुई,
- हंगेरियन- ओल्डोज़ेटी यूनेप।
- स्पेनिश में इसे फिएस्टा डेल कोर्डेरो या फिएस्टा डेल बोर्रेगो (दोनों का अर्थ "मेमने का त्योहार) के रूप में जाना जाता है।
- इसे ईरान में عید قربان (ई़दे-क़ुर्बान) के रूप में भी जाना जाता है,
- तुर्की में कुर्बान बेरामाइ
- बांग्लादेश में बक़र ईद,
- मग्रेब में बड़ी ईद, ईद उल अधा
- सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया में हरि राया आइदुलाधा, हारी राया के रूप में और
- फ़िलीपींस में क़ुर्बान,
- पाकिस्तान और भारत में بقر عید "बक़र ईद" के रूप में,
- त्रिनिदाद में बकरा ईद,
- सेनेगल, गिनी, और गाम्बिया में तबस्की या टोबास्की के रूप में।
- ईद की नमाज़
सामूहिक तौर पर ईद की नमाज़ अदा की जानी चाहिए। प्रार्थना मण्डली में महिलाओं की भागीदारी समुदाय से समुदाय में भिन्न होती है। इसमें दो राकात (इकाइयाँ) शामिल हैं, जिसमें पहली राकात में सात तक्बीर और दूसरी राकात में पाँच तकबीरें हैं। शिया मुसलमानों के लिए, सलात अल-ईद पाँच दैनिक विहित प्रार्थनाओं से अलग है जिसमें कोई ईशान (नमाज़ अदा करना) या इक़ामा (कॉल) दो ईद की नमाज़ के लिए स्पष्ट नहीं है। सलाम (प्रार्थना) के बाद इमाम द्वारा खुतबा, या उपदेश दिया जाता है।
प्रार्थनाओं और उपदेशों के समापन पर, मुसलमान एक दूसरे के साथ गले मिलते हैं और एक दूसरे को बधाई देते हैं (ईद मुबारक), उपहार देते हैं और एक दूसरे से मिलते हैं। बहुत से मुसलमान अपने ईद त्योहारों पर अपने गैर-मुस्लिम दोस्तों, पड़ोसियों, सहकर्मियों और सहपाठियों को इस्लाम और मुस्लिम संस्कृति के बारे में बेहतर तरीके से परिचित कराने के लिए इस अवसर पर आमंत्रित करते हैं।
इस्लामिकपीडिया के अनुसार, बकराईद (ईद-अल-अज़हा) की नमाज़ दो रकअत होती है, जो बग़ैर अज़ान और इक़ामत के जमाअत से अदा की जाती है। इस नमाज़ में तकबीरें ज़्यादा होती हैं — पहली रकअत में सामान्यतः ६ और दूसरी रकअत में ५, हालाँकि यह संख्या अलग-अलग इस्लामी फिरकों में थोड़ी भिन्न हो सकती है। नमाज़ के बाद इमाम द्वारा ख़ुत्बा (उपदेश) दिया जाता है, जिसे सुनना सुन्नत माना जाता है। मुसलमानों को सलाह दी जाती है कि वे इस दिन अच्छे कपड़े पहनें, इत्र लगाएँ और नमाज़ को खुले मैदान या बड़े जमावड़े में अदा करें।
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